मिथिलाक्षर

मैथिली भाषा की लिपि

मिथिलाक्षर लिपि अथवा तिरहुता का प्रयोग लोग भारत के उत्तर बिहार एवं नेपाल के तराई क्षेत्र की मैथिली भाषा को लिखने के लिये करते हैं। इसे 'मैथिली लिपि', 'वैदेही लिपि' और 'तिरहुता' भी कहा जाता है। इस लिपि का प्राचीनतम नमूना दरभंगा जिला के कुशेश्वरस्थान के निकट तिलकेश्वरस्थान के शिव मन्दिर में है। इस मन्दिर में पूर्वी विदेह प्राकृत में लिखा है कि मन्दिर 'कात्तिका सुदी' (अर्थात कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) शके १२५ (अर्थात २०३ ई सन्) में बना था। इस मन्दिर की लिपि और आधुनिक तिरहुता लिपि में बहुत कम अन्तर है।

किन्तु २1वीं शताब्दी में क्रमश: अधिकांश मैथिली के लोगों ने मैथिली लिखने के लिये देवनागरी का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया। किन्तु अब भी कुछ पारम्परिक ब्राह्मण (पण्डित) और कायस्थ द्वारा 'पाता' (विवाह आदि से सम्बन्धित पत्र) भेजने के लिये इसका प्रयोग करते हैं। सन् २००३ ईसवी में इस लिपि के लिये फॉण्ट का विकास किया गया था।

मिथिलाक्षर वास्तुतः बांग्ला, उड़िया और आसामी लिपि की जननी मानी जाती है। इस कारण यह लिपि बंगला लिपि से मिलती-जुलती है किन्तु उससे थोड़ी-बहुत भिन्न है। यह पढ़ने में बंगला लिपि की अपेक्षा कठिन है।

तिरहुत लिपि के व्यंजन वर्ण

वर्णमाला

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स्वर वर्ण

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स्वतन्त्र रूप गौण रूप देवनागरी लिपि में]]
चित्र चिह्न चित्र चिह्न स्वतन्त्र गौण
  𑒁
  𑒂    𑒰
  𑒃    𑒱 ि
  𑒄    𑒲
  𑒅    𑒳
  𑒆    𑒴
  𑒇    𑒵
  𑒈    𑒶
  𑒉    𑒷
  𑒊    𑒸
  𑒋    𑒹
   𑒺
  𑒌    𑒻
  𑒍    𑒼
   𑒽
  𑒎    𑒾

व्यञ्जन वर्ण

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चित्र चिह्न देवनागरी लिपि में]]
  𑒏
  𑒐
  𑒑
  𑒒
  𑒓
  𑒔
  𑒕
  𑒖
  𑒗
  𑒘
  𑒙
  𑒚
  𑒛
  𑒜
  𑒝
  𑒞
  𑒟
  𑒠
  𑒡
  𑒢
  𑒣
  𑒤
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  𑒦
  𑒧
  𑒨
  𑒩
  𑒪
  𑒫
  𑒬
  𑒭
  𑒮
  𑒯

संख्याएँ

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चित्र                    
चिह्न 𑓐 𑓑 𑓒 𑓓 𑓔 𑓕 𑓖 𑓗 𑓘 𑓙
देवनागरी लिपि में

चित्र दीर्घा

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सहोदर का शिलालेख जो मैथिली लिपि में है (950 ई० में अंकित)

इन्हें भी देखें

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बाहरी कड़ियाँ

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